Top 50 Mirza Ghalib Shayari in Hindi & Urdu 2026 | Best Ghazal, Quotes & Poetry Collection
मिर्ज़ा ग़ालिब उर्दू और फ़ारसी साहित्य के सबसे महान शायरों में गिने जाते हैं। उनकी शायरी में इश्क़, दर्द, ज़िंदगी, तन्हाई, इंसानी जज़्बात और गहरे फ़लसफ़े का ऐसा संगम देखने को मिलता है, जो आज भी करोड़ों लोगों के दिलों को छूता है। ग़ालिब के अशआर केवल पढ़े नहीं जाते, बल्कि महसूस किए जाते हैं। यही वजह है कि उनकी शायरी आज भी उतनी ही लोकप्रिय है, जितनी उनके दौर में थी।
इस पेज पर आपको Top 50 Mirza Ghalib Shayari in Hindi & Urdu 2026 का बेहतरीन संग्रह मिलेगा। इसमें इश्क़ पर मशहूर शेर, दर्द भरी शायरी, दिल को छू लेने वाली ग़ज़लें, ज़िंदगी पर ग़ालिब के विचार, मोहब्बत की शायरी और उनके सबसे लोकप्रिय अशआर शामिल हैं। हर शायरी को आप आसानी से पढ़ सकते हैं, कॉपी कर सकते हैं, इमेज के रूप में डाउनलोड कर सकते हैं और WhatsApp, Facebook, Instagram तथा अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर शेयर कर सकते हैं।
मिर्ज़ा ग़ालिब की लेखनी की सबसे बड़ी खूबी उनकी गहराई और सरलता का अनोखा मेल है। उनके शेर हर बार पढ़ने पर नया अर्थ देते हैं और इंसान को सोचने पर मजबूर कर देते हैं। यही कारण है कि ग़ालिब की शायरी साहित्य प्रेमियों, छात्रों, लेखकों और शायरी के शौकीनों के बीच हमेशा पसंद की जाती है।
अगर आप मिर्ज़ा ग़ालिब की सबसे प्रसिद्ध, दिल को छू लेने वाली और कालजयी शायरी पढ़ना चाहते हैं, तो यह संग्रह आपके लिए एक आदर्श स्थान है। हम समय-समय पर इस पेज को नई और लोकप्रिय ग़ालिब की शायरियों के साथ अपडेट करते रहते हैं, ताकि आपको हमेशा बेहतरीन और प्रामाणिक संग्रह एक ही जगह मिल सके।
इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश 'ग़ालिब',
कि लगाए न लगे और बुझाए न बने।
इश्क़ ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया,
वर्ना हम भी आदमी थे काम के।
मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का,
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले।
उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़,
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है।
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है,
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है।
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल,
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है।
आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक,
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक।
ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता,
अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता।
हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद,
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है।
दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त दर्द से भर न आए क्यूँ,
रोएँगे हम हज़ार बार कोई हमें सताए क्यूँ।
जी ढूँडता है फिर वही फ़ुर्सत कि रात दिन,
बैठे रहें तसव्वुर-ए-जानाँ किए हुए।
तिरे वादे पर जिए हम तो ये जान झूट जाना,
कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ए'तिबार होता।
निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन,
बहुत बे-आबरू हो कर तिरे कूचे से हम निकले।
कोई मेरे दिल से पूछे तिरे तीर-ए-नीम-कश को,
ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता।
इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा,
लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं।
क़ासिद के आते-आते ख़त इक और लिख रखूँ,
मैं जानता हूँ वो जो लिखेंगे जवाब में।
हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है,
वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता।
रोने से और इश्क़ में बेबाक हो गए,
धोए गए हम इतने कि बस पाक हो गए।
आईना देख अपना सा मुँह ले के रह गए,
साहब को दिल न देने पे कितना ग़ुरूर था।
मेहरबाँ हो के बुला लो मुझे चाहो जिस वक़्त,
मैं गया वक़्त नहीं हूँ कि फिर आ भी न सकूँ।
दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ,
मैं न अच्छा हुआ बुरा न हुआ।
मौत का एक दिन मुअय्यन है,
नींद क्यूँ रात भर नहीं आती।
फिर उसी बेवफ़ा पे मरते हैं,
फिर वही ज़िंदगी हमारी है।
वो आए घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है,
कभी हम उन को कभी अपने घर को देखते हैं।
दिल से तेरी निगाह जिगर तक उतर गई,
दोनों को इक अदा में रज़ामंद कर गई।
बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना,
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना।
दर्द जब दिल में हो तो दवा कीजे,
दिल ही जब दर्द हो तो क्या कीजे।
मैं ने चाहा था कि अंदोह-ए-वफ़ा से छूटूँ,
वो सितमगर मिरे मरने पे भी राज़ी न हुआ।
मरते हैं आरज़ू में मरने की,
मौत आती है पर नहीं आती।
ख़त लिखेंगे गरचे मतलब कुछ न हो,
हम तो आशिक़ हैं तुम्हारे नाम के।
अर्ज़-ए-नियाज़-ए-इश्क़ के क़ाबिल नहीं रहा,
जिस दिल पे नाज़ था मुझे वो दिल नहीं रहा।
आए है बेकसी-ए-इश्क़ पे रोना 'ग़ालिब',
किस के घर जाएगा सैलाब-ए-बला मेरे बाद।
इश्क़ मुझ को नहीं वहशत ही सही,
मेरी वहशत तेरी शोहरत ही सही।
इश्क़ से तबीअत ने ज़ीस्त का मज़ा पाया,
दर्द की दवा पाई दर्द-ए-बे-दवा पाया।
एतबार-ए-इश्क़ की ख़ाना-ख़राबी देखना,
ग़ैर ने की आह लेकिन वो ख़फ़ा मुझ पर हुआ।
इब्न-ए-मर्यम हुआ करे कोई,
मेरे दुख की दवा करे कोई।
जब कि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद,
फिर ये हंगामा ऐ ख़ुदा क्या है।
हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन,
दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है।
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।
की मिरे क़त्ल के बाद उस ने जफ़ा से तौबा,
हाए उस ज़ूद-पशेमाँ का पशेमाँ होना।
बे-ख़ुदी बे-सबब नहीं 'ग़ालिब',
कुछ तो है जिस की पर्दा-दारी है।
ज़िक्र उस परी-वश का और फिर बयान अपना,
बन गया रक़ीब आख़िर जो था राज़-दाँ अपना।
आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे,
ऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझ सा कहें जिसे।
आँख की तस्वीर सर-नामे पे खींची है कि ता,
तुझ पे खुल जावे कि इस को हसरत-ए-दीदार है।
पूछते हैं वो कि 'ग़ालिब' कौन है,
कोई बतलाओ कि हम बतलाएँ क्या।
वो फ़िराक़ और वो विसाल कहाँ,
वो शब-ओ-रोज़ ओ माह-ओ-साल कहाँ।
जान तुम पर निसार करता हूँ,
मैं नहीं जानता दुआ क्या है।
ये हम जो हिज्र में दीवार-ओ-दर को देखते हैं,
कभी सबा को कभी नामा-बर को देखते हैं।
कहूँ किस से मैं कि क्या है शब-ए-ग़म बुरी बला है,
मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता।
मजनूँ को बुरा कहती है लैला मिरे आगे,
आसिक़ हूँ पे माशूक़-फ़रेबी है मिरा काम।